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  3. संपादकीय: महंगाई की मार

बाजार में आलू की खुदरा कीमत पचास से साठ रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। यही आलू कुछ समय पहले बीस से तीस रुपए प्रति किलो मिल रहा था। कुछ महीने पहले प्याज की कीमतों की वजह से महंगाई बहस का एक मुद्दा थी और सरकार पर सवाल उठने लगे थे। उसके बाद इसकी कीमतें गिरने लगीं और एक महीने पहले तक प्याज ज्यादातर लोगों की पहुंच में था।

कोरोना काल में खाने-पीने की चीजेंं हुई महंगी। फााइल फोटो।

महामारी की मार से देश की अर्थव्यवस्था पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रही है। ऐसे में लोगों के सामने खाने-पीने की चुनौतियां गहराने लगी हैं तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। अभी हालत है कि ज्यादातर लोगों की थाली से सब्जियों सहित जरूरी पोषक तत्त्व भी गायब होने लगे हैं। जो आलू आमतौर पर सबकी पहुंच में रहता आया है और खासतौर पर गरीब तबकों की थाली में सब्जी की कमी पूरा करने में सबसे ज्यादा सहायक रहा है, अब बहुत सारे लोग सिर्फ उसकी कीमत पूछ कर मायूस हो जाने की हालत में हैं।

बाजार में आलू की खुदरा कीमत पचास से साठ रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। यही आलू कुछ समय पहले बीस से तीस रुपए प्रति किलो मिल रहा था। कुछ महीने पहले प्याज की कीमतों की वजह से महंगाई बहस का एक मुद्दा थी और सरकार पर सवाल उठने लगे थे। उसके बाद इसकी कीमतें गिरने लगीं और एक महीने पहले तक प्याज ज्यादातर लोगों की पहुंच में था। लेकिन अब एक बार फिर प्याज के दाम आसमान छूने लगे हैं और बाजार में यह अस्सी रुपए प्रति किलो या इससे ज्यादा भाव में भी बिकने लगा है। इसके अलावा भी कई हरी सब्जियों की कीमतें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। जबकि जाड़े की आहट के साथ आमतौर पर सब्जियां सस्ती हो जाती थीं।

सवाल है कि जिस दौर में नियमन के स्तर पर प्रशासन बाजार से लेकर हर क्षेत्र में हावी दिख रहा है, सरकार नागरिकों को हर सुविधा मुहैया कराने के लिए भ्रष्टाचार दूर करने का दावा कर रही है, उसमें आखिर किन वजहों से सारी सब्जियों की कीमतें बेलगाम हो गई हैं! दूसरी ओर, हकीकत यह भी है कि मार्च में लागू पूर्णबंदी आज भी पूरी तरह नहीं खुली है, जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था सामान्य हालत में नहीं है। इसकी वजह से पहले ही बड़ी तादाद में लोग बेरोजगार हो चुके हैं, उनका व्यवसाय ठप हो चुका है और आय के साधन नहीं हैं।

बाजार में कामकाज अभी भी ठीक से चलना शुरू नहीं हुआ है। इसकी वजह यह है लोगों के पास सहजता से खर्च करने के लिए या तो पैसे नहीं हैं या फिर वे सावधानी बरतने लगे हैं। ऐसे में खाने-पीने के सामानों की बेकाबू कीमतें कैसा असर डाल रही होंगी, यह समझना मुश्किल नहीं है। सवाल है कि पर्याप्त उपज होने के बावजूद महंगाई इस कदर बेलगाम क्यों हो गई है! आखिर समूचा तंत्र कैसे काम करता है कि एक ओर किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत नहीं मिल पाती है और दूसरी ओर बाजार में ग्राहकों को वही वस्तुएं ऊंची कीमतों पर मिलती हैं?

गौरतलब है कि हाल में की गई एक व्यवस्था के तहत रोजाना उपयोग में आने वाले कुछ अनाजों के साथ-साथ आलू-प्याज को भी आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया गया है। इसका मतलब है कि जिन कारोबारियों के पास संसाधन हैं, वे इनका भंडारण कर सकेंगे। अगर इस पर्दे में आलू-प्याज या दूसरी वस्तुओं की जमाखोरी ने जड़ जमाया तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में लोगों की रसोई और थाली में कैसे वक्त आ सकते हैं!

भारत में आबादी का एक बड़ा हिस्सा वैसे भी गरीबी का दंश झेलते हुए जीता है और उसके लिए किसी तरह पेट भर पाना एक बड़ी समस्या होती है। मगर मौजूदा दौर में वे न्यूनतम पोषण वाले भोजन से भी दूर होते जा रहे हैं। हालांकि इसका असर निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भी पड़ना शुरू हो गया है और उनकी थाली में भी महंगाई की वजह से होने वाली कटौती साफ नजर आने लगी है।

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